रामराम जी
निशा बनी नृत्यांगना की पायल के घुँघरू सितारे बनकर छिटके मिले
तपिश तपते हुए मन की पिघलकर समन्दर में नहाकर याद का दीपक जलाती है
खूबसूरत ख्वाब सा ख्वाबो में दिखाकर तेरी तस्वीर फिर ख्वाब सजाती है
मौत से जूझती कत्ल होती सी रात खिलने का हुनर भोर को सौप जाती है
भोर आकर बिखरे ख्वाबों को....दामन में दमकते पुष्प सा खिलाती है
सूरज बहने लगा नदी बन ,जज्ब जज्बात पहाड़ पर दिखे थे बर्फ से
पंछी उड़ चले गगन की छाती पर हौसलों के पंख पसारे आज फिर
देखना है वक्त कितना सफर तय करेगा जिन्दगी का मेरी ..या डूबा देगा मुझे मुझ्धार में
क्या तुमने भी सुना .. दुनिया की सहर का सूरज मुस्कुराया है --- विजय
तपिश तपते हुए मन की पिघलकर समन्दर में नहाकर याद का दीपक जलाती है
खूबसूरत ख्वाब सा ख्वाबो में दिखाकर तेरी तस्वीर फिर ख्वाब सजाती है
मौत से जूझती कत्ल होती सी रात खिलने का हुनर भोर को सौप जाती है
भोर आकर बिखरे ख्वाबों को....दामन में दमकते पुष्प सा खिलाती है
सूरज बहने लगा नदी बन ,जज्ब जज्बात पहाड़ पर दिखे थे बर्फ से
पंछी उड़ चले गगन की छाती पर हौसलों के पंख पसारे आज फिर
देखना है वक्त कितना सफर तय करेगा जिन्दगी का मेरी ..या डूबा देगा मुझे मुझ्धार में
क्या तुमने भी सुना .. दुनिया की सहर का सूरज मुस्कुराया है --- विजय

No comments:
Post a Comment