Friday, 11 October 2013

सूरज का आगमन जलाता आस का दीप ,

सूरज का आगमन जलाता आस का दीप ,
अंधकार होगा समाप्त होगा उजास ...फैलेगा प्रकाश
खिलेंगे पुष्प और जीवन दौड़ेगा कठिन राहों पर भी 
एक छोर से दूसरे छोर गूंजेगा संगीत मदिर मदिर मद्धम स्वर में 
सो जाएगी निराशा भी ..आशा के काँधे सर टिका .- विजयलक्ष्मी



Sunday, 6 October 2013

"वक्त को पकड़ने की चाहत ने जगा दिया ख्वाब से पहले "



"वक्त को पकड़ने की चाहत ने जगा दिया ख्वाब से पहले 
और सूरज का इंतजार हुआ चाहता है जाग जागकर यहाँ 
बात कल की वक्त से पिछड़ कर खामोश से बीतते दिवस को देखा किये अकेला बैठकर
और जिन्दगी को जाते हुए देखा था खुद को लपेटकर 
भोर का सूरज निकलकर पूछेगा नैनो से ख्वाब खोये क्यूँ 
ये बता जब साथ था नूर मेरा फिर तुम रोये क्यूँ 
कैसे कहूं हर लम्हा उजाले का भी तुम बिन लगे है घनेरी रात सी 
और जब मुस्कुरादो तुम नजर में बैठकर रात गहरी भी खिले उगते हुए जज्बात सी 
आओ सूरज का स्वागत करें मुस्कुराकर झूमते गगन और खिलते फूल है धरा पर 
भोर चिड़ियों को बुला रही है स्वागत गीत गाने के लिए 
भावना लिए सौम्य से स्नेह सज्जित स्वप्न सच बनाने के लिए
और अम्बर शर्म से सिंदूरी सा हुआ मिलन के अहसास से 
नदी स्नेह की बह उठी ,, खेलती है लहरे प्रथम किरण के सलौने अहसास से 
मंत्रोच्चार के साथ घंटी बज रही है मन्दिर में जैसे 
अनुपन छटा सी उतरेगी अंगना में मेरे मुस्कुराता है तुलसी का पौधा . "- विजयलक्ष्मी 

Friday, 27 September 2013

भोर बेला महक उठी





















भोर बेला महक उठी संग सूरज का पाकर
बह रही बन अहसास की नदी थी 

नदी बहती रही तटों के बीच 
संग बिन पतवार नाव थी 
खाती थी हिचकौले 
मगर लहरों पर सवार थी
टूटे पत्थरों की चोट से घायल भी बहुत 
सुरत रुकने की मगर नागंवार थी
है आज भी उसी नदी के बीच
जिसमे बहती अहसास की जलधार थी .- विजयलक्ष्मी

प्यार की परिभाषा कब गुम हो पाती है




















परिभाषाये तो नित नई बन जाती है ,
प्यार की परिभाषा कब गुम हो पाती है 
देह की देहलीज पर ताले पड़े है यहाँ मत देखना 
रूह से मिलने की तलब पूरी नहीं होती 
वासना का वास देह के साथ मरेगा डूबकर 
यहाँ तो साधना और उपासना रहती है जाने कब से
मन्दिरों में घंटी संग मन्त्रोच्चार भरी आवाज गूंजती है
मेरे चहुँ ऑर ढोल और मृदंग के संग में .
खिलता है दिन लिए सूरज का संग भोर के रंग में
सिंदूरी साथ चलता साथ सूरज सी आग अंग में - विजयलक्ष्मी