भोर बेला महक उठी
भोर बेला महक उठी संग सूरज का पाकर
बह रही बन अहसास की नदी थी
नदी बहती रही तटों के बीच
संग बिन पतवार नाव थी
खाती थी हिचकौले
मगर लहरों पर सवार थी
टूटे पत्थरों की चोट से घायल भी बहुत
सुरत रुकने की मगर नागंवार थी
है आज भी उसी नदी के बीच
जिसमे बहती अहसास की जलधार थी .- विजयलक्ष्मी
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