Friday, 27 September 2013

भोर बेला महक उठी





















भोर बेला महक उठी संग सूरज का पाकर
बह रही बन अहसास की नदी थी 

नदी बहती रही तटों के बीच 
संग बिन पतवार नाव थी 
खाती थी हिचकौले 
मगर लहरों पर सवार थी
टूटे पत्थरों की चोट से घायल भी बहुत 
सुरत रुकने की मगर नागंवार थी
है आज भी उसी नदी के बीच
जिसमे बहती अहसास की जलधार थी .- विजयलक्ष्मी

प्यार की परिभाषा कब गुम हो पाती है




















परिभाषाये तो नित नई बन जाती है ,
प्यार की परिभाषा कब गुम हो पाती है 
देह की देहलीज पर ताले पड़े है यहाँ मत देखना 
रूह से मिलने की तलब पूरी नहीं होती 
वासना का वास देह के साथ मरेगा डूबकर 
यहाँ तो साधना और उपासना रहती है जाने कब से
मन्दिरों में घंटी संग मन्त्रोच्चार भरी आवाज गूंजती है
मेरे चहुँ ऑर ढोल और मृदंग के संग में .
खिलता है दिन लिए सूरज का संग भोर के रंग में
सिंदूरी साथ चलता साथ सूरज सी आग अंग में - विजयलक्ष्मी