परिभाषाये तो नित नई बन जाती है ,
प्यार की परिभाषा कब गुम हो पाती है
देह की देहलीज पर ताले पड़े है यहाँ मत देखना
रूह से मिलने की तलब पूरी नहीं होती
वासना का वास देह के साथ मरेगा डूबकर
यहाँ तो साधना और उपासना रहती है जाने कब से
मन्दिरों में घंटी संग मन्त्रोच्चार भरी आवाज गूंजती है
मेरे चहुँ ऑर ढोल और मृदंग के संग में .
खिलता है दिन लिए सूरज का संग भोर के रंग में
सिंदूरी साथ चलता साथ सूरज सी आग अंग में - विजयलक्ष्मी

No comments:
Post a Comment