Tuesday, 9 December 2014

" भोर हुए माथे पर बिंदिया सा सज जाता है वो "


वो कौन झांकता है भोर के झरोखे से पडोसी सा
आंगन के पौधे मुस्कुरा उठे पुष्पित से होठों से
यामिनी से चाँद सितारों को गुजरता है कोई 
रागिनी खुशी की हवा में गुंनजित करता है मौन 
पंछियों का कलरव दुलारता है मौन
सिंदूरी सी रक्तिम चुनर उढ़ा धरा को दुल्हन बनाता है कौन 
बूंद बूंद भावो से दुनिया सजाता है मौन 
दूर कर अंधेरा प्रकाश जगाता है जो 
देखो सूरज सा मुस्काता है वो.
भोर हुए माथे पर बिंदिया सा सज जाता है वो 
-- विजयलक्ष्मी 

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