Sunday, 10 May 2015

" रात का जाना नई सुबह का आना "

रामराम जी
आज का सूरज निहार लो मन भरके
आने वाली सुबह नई आस का होगा
नये अंदाज़ , नये वर्ष के कांधों पर सवार
समय का हाथ थामे सूरज सूरत बदलेगा या सीरत नहीं मालूम
बस इतनी बात पक्की है बदल जाएगा कलैण्डर का पन्ना उस पर लिखा समय
दिन तारीख ....साल के साथ बदलते हैं नक्षत्र
नहीं बदलते धरती का इंतज़ार
नई सुबह होगी ये एतबार
ओस का गिरना फूल का खिलना
धरा का नित्य ही संवरना
रात का जाना नई सुबह का आना
और.....मेरी आंख का विश्वास
मचलना निखरना संवरना संवर्धित होता रहे--- विजय 

Tuesday, 9 December 2014

" भोर हुए माथे पर बिंदिया सा सज जाता है वो "


वो कौन झांकता है भोर के झरोखे से पडोसी सा
आंगन के पौधे मुस्कुरा उठे पुष्पित से होठों से
यामिनी से चाँद सितारों को गुजरता है कोई 
रागिनी खुशी की हवा में गुंनजित करता है मौन 
पंछियों का कलरव दुलारता है मौन
सिंदूरी सी रक्तिम चुनर उढ़ा धरा को दुल्हन बनाता है कौन 
बूंद बूंद भावो से दुनिया सजाता है मौन 
दूर कर अंधेरा प्रकाश जगाता है जो 
देखो सूरज सा मुस्काता है वो.
भोर हुए माथे पर बिंदिया सा सज जाता है वो 
-- विजयलक्ष्मी 

Friday, 17 October 2014

ॐ सूर्याय नम: !!

रामराम जी
ॐ सूर्याय नम: !!
रोशन हुई धरा ,,जनगण जीवन पाता है
अँधेरा भी घर सांकल लगा लेता है 
मंत्रोच्चार गूंज उठते हैं ,बजती है मन्दिर की घंटिया
सूरज के दर्शन ..पंछियों की मधुर कलरव
मद्धम सी बहती बयार ..सिहरती सी शाख पर महकती कलियाँ
ओस बरसी हुई सुखद सा अहसास दे जाती है ,गुनगुनाती सी सुबह
और सूर्य दर्शन ...जैसे जीवन बरस गया धरती पर
अनायास सी मुस्कुराहट पसर जाती है प्रकृति के होठो पर
चकित सी देखती हूँ चमत्कृत करती भोर को
जो अल सुबह दुल्हन सी संवर जाती है नजरे देहलीज पर गडाये
जैसे सारी रात जागकर काटी है उलाहना लिए
महकती सी लगती है
जैसे कह रही हो ..लो शुरू हुई आज की यात्रा --- विजयलक्ष्मी 

Thursday, 18 September 2014

" सफरनामा "

रात का सफर चलता है साथ दिन के ,
वक्त की शिनाख्त तेरे साथ हो चली 


मेरी जिन्दगी की शाम औ सहर सब कुर्बान है 
रौशनी तुम्हारी ए सूरज मेरे संग हो चली 


बजते हैं साज सारे दिनमान रंग सारे 

चहक कर महकना हर अंगसंग हो चली 


पैमाना ए तरद्दुद जिन्दगी का सफर 

ये जिन्दगी खुदावंद खुदाई पैरहन हो चली .- विजयलक्ष्मी 

" फख्र होगा मरकर भी जिन्दा रहेंगे"

" कुछ लम्हों की चुप्पी को हार मत समझना ,
हौसले मेरे,उड़ान थमने नहीं देंगे याद रखना

हूँ अनजान राहों से, मंजिल मिल ही जाएगी
घायल हूँ मगर जिन्दा नहीं मरेंगे याद रखना

माना मौत हमसफर है कत्ल करेगी मुझको
फख्र होगा मरकर भी जिन्दा रहेंगे याद रखना

बहुत देखली दुनिया झूठ-सच के फंदे भी देखे
देखी मक्कारी श्रृंगालो सी कहेंगे याद रखना

मुखौटे संग देखे मुखौटो में छिपे अपने पराये
जब चाह अपनाया, परायापन देखेंगे याद रखना

चला दो खंजर अपना लहू बहता है बहने दो
सिला जख्मों का रुके क्यूँ असर देखेंगे याद रखना " --- विजयलक्ष्मी 

Sunday, 13 July 2014

क्या तुमने भी सुना .. दुनिया की सहर का सूरज मुस्कुराया है ..

रामराम जी
निशा बनी नृत्यांगना की पायल के घुँघरू सितारे बनकर छिटके मिले
तपिश तपते हुए मन की पिघलकर समन्दर में नहाकर याद का दीपक जलाती है
खूबसूरत ख्वाब सा ख्वाबो में दिखाकर तेरी तस्वीर फिर ख्वाब सजाती है 

मौत से जूझती कत्ल होती सी रात खिलने का हुनर भोर को सौप जाती है
भोर आकर बिखरे ख्वाबों को....दामन में दमकते पुष्प सा खिलाती है
सूरज बहने लगा नदी बन ,जज्ब जज्बात पहाड़ पर दिखे थे बर्फ से
पंछी उड़ चले गगन की छाती पर हौसलों के पंख पसारे आज फिर
देखना है वक्त कितना सफर तय करेगा जिन्दगी का मेरी ..या डूबा देगा मुझे मुझ्धार में
क्या तुमने भी सुना .. दुनिया की सहर का सूरज मुस्कुराया है
--- विजय

Friday, 20 June 2014

जलता हुआ सूरज




तमककर जलता हुआ सूरज भोर का ,
कितना और झूठ बोलेगा हंस रहा हूँ मैं ,
कितना खुश दीखता हुआ करे ए प्रभु 
मन की ख़ुशी दे ,वो दिल मुस्कुराया करे 
जलते हैं गुल तपिश से जिसकी 
आसमा को आषाढ़ के आँसू सा न रुलाया करे .-- विजय